Sunday, August 7, 2022
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राजस्व की लूट : बाल्को और हिंडाल्को ने सालों छिपाया मुनाफा , जनता को लगाया अरबों का चूना

वेदान्ता समूह के बाल्को द्वारा देश के गरीब आदिवासी/वनवासी जनता का शोषण कर ,राजनैतिक दलों को करोडों रुपयों का चुनावी चन्दा देकर ,प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत से किस प्रकार देश के राजस्व की लूट की जा रही हैं उसे देश की जनता को अवश्य जानना चाहिए ,इसलिए अपनी पत्रकारिता के सरोकारों को समझते हुए सोनभद्र से प्रकाशित विंध्यलीडर ,देश की लब्ध प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका कारवां में प्रकाशित खोज परक रिपोर्ट को साभार प्रस्तुत करता हैं – पार्ट 2          राजेंद्र द्विवेदी      

1965 में एक सार्वजनिक कंपनी के रूप में स्थापित बाल्को ने अपना पहला उत्पादन केंद्र यहीं स्थापित किया और आज भी इसे संचालित करती है. निजी हितों को इसे सुपुर्द किए जाने से पहले, बाल्को के इतिहास में भारत के रॉकेट तथा बैलिस्टिक प्रोग्रामों में उपयोग में लाए जाने वाले हल्के एल्युमिनियम अयस्क का विकास तथा देश के न्यूक्लियर परीक्षणों के लिए कंपोनेंट की आपूर्ति करना शामिल है.

निजी हितों को इसे सुपुर्द किए जाने से पहले, बाल्को के इतिहास में भारत के रॉकेट तथा बैलिस्टिक प्रोग्रामों में उपयोग में लाए जाने वाले हल्के एल्युमिनियम अयस्क का विकास तथा देश के न्यूक्लियर परीक्षणों के लिए कंपोनेंट की आपूर्ति करना शामिल है. कंपनी की कोरबा में एक पूरी टाऊनशिप है, जिसे बाल्को नगर कहा जाता है, यह 3,000 एकड़ के भूभाग में फैला हुआ है. इस टाऊनशिप में दो स्मेल्टर प्लांट और उत्पादन फैसिलिटीज हैं, जो एल्युमिनियम सिल्लियां, एलॉय सिल्लियां, वायररौड्स, बसवार तथा अनगिनत रोल्ड एल्युमिनियम वस्तुओं का उत्पादन करती हैं.

(तीन)

जब जे एन सिंह हिंडाल्को के कामों के बारे में जानकारी जुटा रहे थे, उन्हें छत्तीसगढ़ के कोरबा में एल्युमिनियम उत्पादन में अनियमितताओं के बारे में सुराग मिला. रेणुकूट की तरह एक औद्योगिक शहर कोरबा सिंह के गृहनगर से सड़क मार्ग से 350 किमी दक्षिण में स्थित है और इसका भी एल्युमिनियम उद्योग से लंबा संबंध रहा है. 1965 में एक सार्वजनिक कंपनी के रूप में स्थापित बाल्को ने अपना पहला उत्पादन केंद्र यहीं स्थापित किया और आज भी इसे संचालित करती है. निजी हितों को इसे सुपुर्द किए जाने से पहले, बाल्को के इतिहास में भारत के रॉकेट तथा बैलिस्टिक प्रोग्रामों में उपयोग में लाए जाने वाले हल्के एल्युमिनियम अयस्क का विकास तथा देश के न्यूक्लियर परीक्षणों के लिए कंपोनेंट की आपूर्ति करना शामिल है. कंपनी की कोरबा में एक पूरी टाऊनशिप है, जिसे बाल्को नगर कहा जाता है, यह 3,000 एकड़ के भूभाग में फैला हुआ है. इस टाऊनशिप में दो स्मेल्टर प्लांट और उत्पादन फैसिलिटीज हैं, जो एल्युमिनियम सिल्लियां, एलॉय सिल्लियां, वायररौड्स, बसवार तथा अनगिनत रोल्ड एल्युमिनियम वस्तुओं का उत्पादन करती हैं.

2001 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार ने बाल्को की एक बहुमत हिस्सेदारी वेदांता की सहायक कंपनी स्टरलाइट इंडस्ट्रीज को बेच दी. यह एक बेहद विवादास्पद फैसला था और इन तमाम आरोपों के बावजूद लिया गया था कि सरकार ने बाल्को की परिसंपत्तियों का मूल्य जानबूझ कर कम लगाया था, जिससे कि यह वेदांता के लिए अनुकूल हो. सरकार के पास बाल्को का अभी भी 49 प्रतिशत स्वामित्व है, हालांकि वेदांता ने बार-बार शेष हिस्सेदारी खरीदने की कोशिश की है.

कोरबा में बाल्को केंद्र. दस्तावेजी विश्लेषण से पता चलता है कि केंद्र ने अपनी स्वीकृत उत्पादन क्षमता को पार कर लिया है. केंद्र हमेशा प्रासंगिक अधिकारियों को अपने उत्पादन की सच्चाई से रिपोर्ट नहीं करता है और उत्पादन की सही मात्रा में भारी छिपाव संभव है. 

दस्तावेजी विश्लेषणों से संकेत मिलता है कि कंपनी ने कोरबा में अपनी स्वीकृत क्षमता से अधिक उत्पादन किया, सभी संगत प्राधिकारियों को कभी भी सच्चाई से उत्पादन की मात्रा की रिपोर्ट नहीं की और हो सकता है कि उसने भारी मात्रा में उत्पादन की जानकारी छिपाई हो.

अक्टूबर 2012 के आखिर में, बिलासपुर में सीईएसटी प्रभाग ने, जिसके अधिकार क्षेत्र में उस समय कोरबा था, ने एक आरटीआई आवेदन का उत्तर दिया था, जिसमें कोरबा केंद्र के उत्पादन आंकड़ों की जानकारी मांगी गई थी (देखें टेबल 5).‘उत्पादन के एक कॉलम में, इसने 2006-07 से लेकर 2011-12 तक के वार्षिक उत्पादनों को सूचीबद्ध किया था, जो प्रति वर्ष 300000 टन से लेकर लगभग 450000 टन के रेंज में थे.‘डिस्पैच‘ नामक एक दूसरे कॉलम में कम संख्याएं सूचीबद्ध की गई थीं, जो ‘उत्पादन के स्तर के एक कॉलम के तहत अनुरूपी वर्ष की संख्याओं के लगभग 60 और 70 प्रतिशत के बीच थे (हो सकता है ‘डिस्पैच‘ संख्याएं एल्युमिनियम की रिपोर्ट की गई मात्रों को परिलक्षित करती हों जिन्हें बाल्को ने बाजार भेजा हो जबकि शेष एल्युमिनियम उत्पादों के इसकी अपनी मैन्यूफैक्चरिंग के लिए जाती हों). सीईएसटी प्रभाग द्वारा इन दो वर्षों के लिए उपलब्ध कराए गए उत्पादन आंकड़े फैसिलिटी की अधिकतम स्वीकृत क्षमता से अधिक रहे जैसाकि छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण बोर्ड के पास दर्ज हैं-जो कुल 250,000 टन से अधिक थे. जाहिर तौर पर इसने बाल्को के लिए यह चिंता का विषय था. 19 नवंबर 2012 को सीईएसटी प्रभाग के आरटीआई उत्तर के तुरंत बाद, बाल्को ने जारी आंकड़ों के संदर्भ के साथ सीईसीबी को एक पत्र लिखा जिसमें उसने कहा कि ‘उत्पाद विभाग द्वारा प्रस्तुत गलत हैं.‘ कंपनी ने यह भी कहा कि इसने क्षेत्राधिकार उत्पाद कार्यालय के साथ अपनी फाइलिंग को ‘सत्यापित‘ किया था और उत्पादन आंकड़ों का एक विभिन्न सेट उपलब्ध कराया (देखें टेबल 6).

बाल्को ने अपने आंकड़ों को ‘उत्पादन‘ और ‘कैप्टिव उपभोग’ के तहत सूचीबद्ध किया यह निर्दिष्ट करते हुए कि बाद की श्रेणी उस एल्युमिनियम से संबंधित है जिसका उपयोग वह अपने ‘विनिर्माणों’ के लिए करती है. कुछ वर्षों को छोड़कर, ‘उत्पादन‘ के तहत संख्याएं व्यापक रूप से आरटीआई उत्तर में संबंधित संख्याओं से मेल खाते थे, हालांकि वे कभी भी एक समान नहीं थे. यहां भी, वे एकसमान रूप से सीईसीबी द्वारा स्वीकृत अधिकतम क्षमता से अधिक थे. लेकिन बाल्को ने ‘निजी उपभोग को छोड़कर उत्पादन‘ का एक मिलान भी उपलब्ध कराया और यहां संख्याएं-लगभग सत्तर से अस्सी प्रतिशत ‘उत्पादन‘ के तहत संबंधित संख्याओं की तुलना में सीईसीबी स्वीकृत सीमाओं के भीतर थीं.

कंपनी ने कहा कि “मध्यवर्त्ती उत्पाद की कैप्टिव खपत को उत्पाद शुल्क से छूट दी गई है…और इसे घोषित अंतिम उत्पाद का हिस्सा नहीं बनना चाहिए क्योंकि सभी मध्यवर्त्ती उत्पाद स्मेल्टर में आरंभिक ऊष्ण धातु निर्माण से निर्मित्त होते हैं.” बाल्को ने कहा कि, “चूंकि एल्युमिनियम वस्तुओं का हमारा परिष्कृत उत्पादन सीईसीबी द्वारा दी गई सहमति की सीमा के भीतर था, इसलिए हमने किसी भी कानून का कोई उल्लंघन नहीं किया है.”

बाल्को ने सीईसीबी के पास जो उत्पादन आंकड़े प्रस्तुत किए, वे सीईएसटी प्रभाग को रिपोर्ट किए गए आंकड़ों की तुलना में एकसमान रूप से अधिक थे. इसका अंतर 2006-07 के लिए 78,000 टन से तथा 2011-12 के लिए लगभग 37,000 टन अधिक था (देखें टेबल 7).

उत्पाद प्राधिकारियों ने इसके बाद अपनी खुद की संख्याओं को संशोधित किया. 2017 में, जब उनके पास अन्य आरटीआई के साथ उनसे संपर्क किया गया तो सीईएसटी ने एल्युमिनियम उत्पादन के वही आंकड़े उपलब्ध कराए जो वर्ष 2006-07 तथा 2008-09 के तथा 2011-12 के भी बीच के वर्षों के लिए सीईसीबी को भेजे गए बाल्को के पत्र में ‘उत्पादन‘ के तहत उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के बिल्कुल समान थे. लेकिन 2009-10 तथा 2010-11 के बीच के वर्षों में, संशोधित आंकड़ों ने इसे ‘कैप्टिव उपभोग को छोड़कर उत्पादन’ के रूप में 2012 के पत्र में सूचीबद्ध कुल उत्पादन के करीब दिखाया.

अगर हम बाल्को द्वारा सीईसीबी को घोषित ‘उत्पादन’ आंकड़ों की सीईएसटी की संशोधित उत्पादन संख्याओं से तुलना करें तो दो बेमेल वर्षों के लिए लगभग 200000 टन का अंतर सामने आता है, जो 1861 करोड़ रुपए के बराबर से अधिक (देखें टेबल 8) है.

यह नोट करना दिलचस्प है कि 2012 में सीईएसटी द्वारा उपलब्ध कराई गई संख्याएं तथा 2017 में इसके द्वारा बताए गए आंकड़े एजेंसी के रिकार्ड में ऊपर की ओर अत्यधिक संशोधन प्रदर्शित करते हैं, कभी-कभी 78000 टन तक जैसे कि वर्ष 2012 में तथा कभी-कभार नीचे की दिशा में संशोधन प्रदर्शित करते हैं, जो 100000 टन से अधिक होता है, जैसेकि वर्ष 2009-10 में.

जब मैंने इस वर्ष कोरबा में मैंने सीईएसटी प्रभाग के सहायक आयुक्त लाल दास से यह पूछा कि क्यों उनके विभाग द्वारा प्रदान किए गए उत्पादन डाटा में इतना अधिक अंतर है, तो दास ने उत्तर देने से मना कर दिया और मुझे सुझाव दिया कि मैं रायपुर में प्रभागीय सीईएसटी मुख्यालय जाकर वहां उनके वरिष्ठ अधिकारियों से बात करूं. मैंने रायपुर में सीईएसटी कार्यालय को प्रश्न ईमेल किए जिनमें कोरबा कार्यालय को भी संदर्भित किया था, लेकिन मुझे कोई उत्तर नहीं प्राप्त हुआ.

2017 में आरटीआई के उत्तर में सीईएसटी प्रभाग ने 2011-12 के बाद के वर्षों के भी जोकि नवीनतम वित्तीय वर्ष तक के थे, के एल्युमिनियम उत्पादन के आंकड़े सूचीबद्ध किए. आईबीएम के ईयरबुक में कोरबा के लिए दिए गए कुल उत्पादन तथा खुद बाल्को द्वारा वर्ष 2012 से पहले के वर्षों के लिए सीईसीबी को उपलब्ध कराए गए आंकड़ों तथा बाद के वर्षों में कंपनी की वार्षिक रिपोर्टों के साथ इनकी तुलना करने से और अधिक विसंगतियां उजागर होती हैं तथा डाटा की सटीकता और सत्यता पर सवाल खड़े होते (देखें टेबल 9) हैं. यह तथ्य कि इन तीनों स्रोतों से प्राप्त संख्याएं 2012-13 के बाद सहमति में हैं, इसलिए खासकर यह आश्चर्यजनक लगता है क्योंकि पिछले वर्षों में उनमें व्यापक असमानताएं रही हैं.

बाल्को के कोरबा के प्रशासन तथा कंपनी मामलों के प्रमुख अवतार सिंह ने मुझे अपने कार्यालय में स्वागत किया लेकिन जब मैंने केंद्र में घूमने के बारे में पूछताछ की तो उन्होंने बाद में कभी आने की बात की. उन्होंने कहा कि वह व्यस्त हैं और मुझे अपने सभी प्रश्नों को उन्हें ईमेल करने को कहा. मैंने सिंह को तथा वेदांता में मीडिया एवं कम्युनिकेशन एक्जेक्यूटिव को प्रचालन, उत्पादन तथा कोरबा केंद्र की क्षमता से संबंधित प्रश्न भेजे लेकिन उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया.

कोरबा केंद्र में वार्षिक 100,000 टन की संस्थापित क्षमता के साथ एक सिंगल स्मेल्टर प्लांट था जब सरकार ने बाल्को में अपनी बहुमत हिस्सेदारी बेची थी. इसे 2012 में सीईएसटी प्रभाग द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़ों में अपग्रेड किया गया था और 2017 में इसने जो संख्याएं बताईं वे एजेंसी के रिकार्ड में बहुत अधिक फेर-बदल दिखाते हैं-कभी-कभी ऊपर की ओर 78000 टन तक तथा कभी-कभार नीचे की दिशा में 100000 टन से अधिक संशोधन प्रदर्शित करते हैं.

खनन मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, 2007-08 में यह 345000 टन था जबकि पुराना संयंत्र बंद हो चुका था. बाल्को की 2011-12 की वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया कि वार्षिक रूप से 245000 टन प्रति वर्ष उत्पादन करने की क्षमता रखने वाला एक स्मेल्टर प्लांट अब ‘कोरबा में चल रहा’ था. इसी दस्तावेज में यह भी रिपोर्ट की गई कि बाल्को कोरबा में 325000 टन प्रति वर्ष उत्पादन करने की क्षमता रखने वाला एक स्मेल्टर प्लांट की स्थापना करने की प्रक्रिया में है, जिसके ‘वित्त वर्ष 2013 की तीसरी तिमाही तक’ प्रचालन आरंभ कर देने की उम्मीद थी. पहले की क्षमता के साथ जोड़े जाने का अर्थ था कि कोरबा फैसिलिटी के पास वर्ष 2014-15 तक 570000 टन वार्षिक की संभावित उत्पादन क्षमता थी. कोरबा के उत्पादन के लिए सीईएसटी के आंकड़ों में उस वर्ष इस सूचित क्षमता की तुलना में 240000 टन से अधिक की कमी, उसके बाद के वर्ष में 230000 टन से अधिक तथा 2016-17 में 140000 टन से अधिक की कमी दर्ज की गई. अगर बाल्को ने वास्तव में इस अवधि का उपयोग अपनी क्षमता में सुधार लाने के लिए किया होता तो वह सीईएसटी प्रभाग द्वारा 6812 करोड़ रुपए के अनुमान से अधिक का उत्पादन अर्जित कर सकता (देखें टेबल 10) था. कोरबा में प्रचालन की प्रत्यक्ष जानकारी रखने वाले एक पुराने श्रमिक ने मुझे बताया कि फैसिलिटी वास्तव में 2010 से ही 570000 टन की वार्षिक क्षमता के साथ उत्पादन कर रही थी.

इन दस्तावेजों के आधार पर असूचित मूल्य को 2009-10 तथा 2010-11 के लिए उत्पादन योगों में बेमेल के पहले के वैल्यू जो लगभग 1862 करोड़ रुपए थी, में जोड़ने से कंपनी की संभावित अंडररिपोर्टिंग 8674 करोड़ रुपए के बराबर या इससे अधिक हो सकती है. बाल्को और वेदांता की अन्य कंपनियों को पिछले कुछ वर्षों में अनगिनत हाई-प्रोफाइल विवादों का सामना करना पड़ा है. 2002 में, सरकार द्वारा बाल्को में बहुमत हिस्सेदारी बेचने के तुरंत बाद, लगभग 1998-99 में, सीबीआई ने कंपनी के पूर्व अध्यक्ष तथा प्रबंध निदेशक एवं चार अन्य व्यक्तियों पर भी एक निजी कंपनी को भारी छूट की अनुमति देने के जरिए कंपनी से करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी करने का आरोप लगाया. दिल्ली की एक जिला अदालत ने 2019 में सभी आरोपितों को दोषी पाया. वेदांता की मूल सहायक कंपनी, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज जिसने बाल्को का अधिग्रहण किया और बाद में जिसका वेदांता इंडस्ट्रीज में विलय कर दिया, पर 2010 में किए गए एक शोध अध्ययन में पाया गया कि पुलिस और ओडिशा के एक राज्य मंत्री ने नियामगिरि क्षेत्र में भारी स्थानीय विरोध के बावजूद वेदांता को एक खनन परियोजना को आगे बढ़ाने में मदद की. जब परियोजना का विरोध करने वाला एक मामलासुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया तो उसकी सुनवाई स्टरलाइट के शेयर रखने वाले एक न्यायाधीश ने की और कंपनी को स्थानीय लोगों के अधिकारों की सुरक्षा करने के लिए नए प्रस्तावों को जमा करने की शर्त पर कंपनी को आगे बढ़ने की अनुमति दे दी गई. उसी वर्ष, उत्पाद विभाग ने स्टरलाइट को 300 करोड़ रुपए से अधिक की बकाया राशि का भुगतान न करने पर नोटिस दिया और सीमा शुल्क अधिकारियों ने पाया कि कंपनी ने 746 करोड़ रुपए के आयात शुल्क की चोरी की है. स्टरलाइट के उपाध्यक्ष को गिरफ्तार कर लिया गया. स्टरलाइट के वेदांता की एक अन्य कंपनी सेसा गोवा के साथ 2012 में विलय हो जाने के बाद कंपनी मामले मंत्रालय ने आरोप लगाया कि यह कदम लगभग 850 करोड़ रुपए की कर चोरी करने के लिए उठाया गया है.

इससे पहले, सीरियस फ्राड इन्वेस्टिगेशन ऑॅफिस ने सेसा गोवा पर 1000 करोड़ रुपए से अधिक का कृत्रिम नुकसान प्रदर्शित करने के लिए निर्यात की इनवायसिंग कम करने और एजेंट कमीशन को बढ़ाने का आरोप लगाया था. 2012 में अभियोजन शुरू करने के प्रयास को रोक दिया गया था और मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद यह मामला और आगे नहीं बढ़ा है. स्टरलाइट और वेदांता ने कोई भी गलत काम करने से इनकार किया है.

2015 में सरकार ने कार्टेलाइजेशन की कथित आशंकाओं के बीच नीलामी के जरिए बाल्को द्वारा प्राप्त एक कोयला ब्लाक के आवंटन को रद्द कर दिया था.(इसके साथ-साथ जिंदल स्टील को तीन अन्य कोयला ब्लाकों का आवंटन भी रद्द कर दिया गया था. बाल्को ने इस निर्णय को अदालत में चुनौती दी थी, लेकिन बाद में मामला वापस ले लिया.

(चार)

कम रिपोर्टिंग की किसी भी वास्तविक मात्रा के निर्धारण तथा संबंधित कंपनियों और सरकारी एजेंसियों को उत्तरदायी ठहराए जाने के लिए एक संपूर्ण, समयबद्ध आधिकारिक जांच की स्पष्ट और अविलंब आवश्यकता है. बहरहाल, सरकार द्वारा उस प्रक्रिया में अभी पहला कदम भी उठाया जाना बाकी है.

दिसंबर 2019 में जेएन सिंह द्वारा सरकार को की गई शिकायतों में केंद्रीय जीएसटी एवं केंद्रीय उत्पाद अधिकारियों, जीएसटी खुफिया महानिदेशालय, राजस्व खुफिया महानिदेशालय और आय कर खुफिया महानिदेशालय (खुफिया और आपराधिक जांच) को भेजी गई प्रस्तुतियां शामिल हैं. शिकायतों को स्वीकर कर लिया गया लेकिन सिंह को उससे संबंधित कोई खबर प्राप्त नहीं हुई. यह देखने के लिए कि क्या उनके प्रयासों की वजह से कोई कार्रवाई की गई है, मैंने दिल्ली में डीजीजीएसटी कार्यालय में प्रधान मुख्य आयुक्त से मिलने की कोशिश की. जब फरवरी के आरंभ में मैं खुद कार्यालय गया तो मुझे मना कर दिया गया.

सिंह ने अपनी शिकायतों पर खुद एक आरटीआई आवेदन दायर कर यह जानने की कोशिश की थी कि सरकार की तरफ से क्या कदम उठाए गए हैं. जनवरी में, उन्हें कदम उठाए जाने से संबंधित बिना किसी ब्योरे के डीजीआरआइ से एक ब्यालरप्लेट यानी कानूनी रूप से औपचारिक उत्तर मिला. उत्तर में कहा गया, “इस कार्यालय को किसी भी प्रकार की जानकारी देने से छूट दी गई है, सिवाय जब भ्रष्टाचार हो या मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप हों.”

(अंग्रेजी कारवां के जुलाई 2021 अंक में प्रकाशित इस कवर स्टोरी को मूल अंग्रेजी में  प्रकाशित किया जा चुका है ।हिंदी अनुवाद : डॉ विजय कुमार शर्मा)

महेश सी डोनिआ स्वत्रंत पत्रकार हैं. वह खोजी समाचार चैनल कोबरापोस्ट के वरिष्ठ संपादक रह चुके हैं.   KEYWORDS:HindalcoBALCOAditya Birla GroupGD BirlaNarendra Modicoal scam

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