Sunday, August 7, 2022
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ऑनलाइन न्यूज़ और डिजिटल पोर्टल पर आने वाला क़ानून क्यों है चर्चा में ?

राजेन्द्र द्विवेदी की खास रिपोर्ट

भारत में डिजिटल यानी ऑनलाइन न्यूज़ मीडिया के लिए कोई नियामक संस्था नहीं है. लेकिन ऐसी ख़बरें हैं कि जल्द ही या इसी मानसून सत्र में सरकार डिजिटल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए क़ानून बनाने जा रही है.

अब सभी डिजिटल मीडिया पोर्टल और वेबसाइट को अपना पंजीकरण करवाना होगा.

1857 में इस क़ानून को प्रेस के माध्यम से , विद्रोह के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया था. आज जब सरकार डिजीटल मीडिया को रेगुलेट करने के लिए कानून लाने जा रही हैं तो कुछ विश्लेषक कहते हैं कि मोदी सरकार असहमति की आवाज़ दबाने की कोशिश कर रही है.

नई दिल्ली । केंद्र सरकार ने इसी मुद्दे पर एक नया विधेयक तैयार किया है. ऐसा कहा जा रहा है कि ये विधेयक इस समय जारी संसद के मानसून सत्र में पेश किया जा सकता है.

सरकार साल 2019 में ही ‘प्रेस और पत्रिका के पंजीकरण विधेयक, 2019’ को नया स्वरूप दे चुकी है. अब जिस विधेयक को लाने की तैयारी है, उसके दायरे में पहली बार डिजिटल समाचार मीडिया इंडस्ट्री को शामिल करने की तैयारी है.

हालांकि, इस विधेयक का कोई मसौदा सामने नहीं है, लेकिन आ रही ख़बरों से पता चला है कि अब सभी डिजिटल मीडिया पोर्टल और वेबसाइट को अपना पंजीकरण करवाना होगा.

इसके बाद डिजिटल न्यूज़ मीडिया को सरकार द्वारा रेगुलेट किया जाएगा.

बताया जा रहा है कि ये नया अधिनियम 155 साल से लागू ‘प्रेस और पुस्तक पंजीकरण अधिनियम, 1867’ की जगह लेगा.

यह क़ानून 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश इंडिया में लागू किया गया था.

उस वक़्त इस क़ानून को प्रेस के माध्यम से, विद्रोह के दौरान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के लिए लाया गया था.

ख़बर लहरिया

ख़त्म होगा पुराना क़ानून

बीते कुछ सालों में भारत में डिजिटल मीडिया के ज़रिए समाचारों के प्रकाशन में बहुत इज़ाफ़ा हुआ है. इन माध्यमों के ज़रिए न्यूज़ देने वाले संस्थानों की संख्या भी काफ़ी बढ़ी है.

लेकिन तमाम परिवर्तनों के बावजूद अब तक 155 साल पुराने क़ानून में किसी ने संशोधन करने की ज़रूरत महसूस नहीं की थी. अब मौजूदा सरकार ने इस नए विधेयक को तैयार किया है जिसके पारित होने पर 1867 वाले क़ानून का अंत हो जाएगा.

लेकिन कई लोगों का तर्क है कि केंद्र सरकार डिजिटल न्यूज़ मीडिया को ‘नियंत्रित’ करने का प्रयास कर रही है.

कुछ विश्लेषक कहते हैं कि मोदी सरकार असहमति की आवाज़ दबाने की कोशिश कर रही है.

पत्रकार और एमनेस्टी इंटरनेशनल मानवाधिकार संस्था के आकार पटेल ने अपने एक लेख में इस विधेयक को प्रेस की आज़ादी के लिए ख़तरा बताया है.

आकार पटेल ने लिखा, “ये भारत के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं हैं. सरकार बेहद शक्तिशाली है और प्रधानमंत्री बहुत लोकप्रिय हैं. विपक्ष फ़िलहाल अपने पैर जमाने का प्रयास कर रहा है.”

मशहूर लेखक और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो वाइस चांसलर सुधीश पचौरी कहते हैं, “ऐसा तो नहीं है कि इस वक़्त डिजिटल मीडिया पर हमले नहीं होते. कोई मामला हुआ तो पुलिस जाती है, मीडिया वाले को गिरफ़्तार कर लेती है. अब तक तो ऐसे मामलों को आईटी क़ानून के तहत दर्ज किया जा रहा है. लेकिन ये किसी सीधे क़ानून के अभाव के कारण ही था. डिजिटल मीडिया के लिए अलग से एक नया क़ानून तो आना ही था.”

डिजिटल न्यूज़

उनके मुताबिक़ ऐसा क़ानून आज नहीं तो कल, कोई न कोई सरकार हो लाएगी ही.

सुधीश पचौरी कहते हैं कि तानाशाही का ख़तरा ‘सिर्फ़ सरकार की तरफ़ से ही नहीं है, अब तो विभिन्न गुटों की तरफ़ से भी उतनी ही तानाशाहियां हैं.”

लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं कि इस विधेयक में बोलने की आज़ादी पर अंकुश लगाने जैसी कोई बात नहीं है.

प्रसार भारती के पूर्व चेयरमैन सूर्य प्रकाश इस तर्क को बेबुनियाद मानते हैं.

वे कहते हैं, “मैंने इस पर मीडिया रिपोर्ट्स देखी हैं, मुझे वहां ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा है जो मेरी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकारों को कम कर देगा.”

सूर्य प्रकाश का कहना है कि ज़माने के हिसाब से पुराने क़ानूनों को बदलना सराहनीय काम है.

उन्होंने विंध्यलीडर को बताया, “प्रस्तावित विधेयक मीडिया को आधुनिक युग में लाने के लिए है. मैंने हाल ही में रॉयटर्स की एक रिपोर्ट देखी जिसमें कहा गया है कि 63 प्रतिशत भारतीय युवा डिजिटल मीडिया पर ही न्यूज़ देखते, सुनते या पढ़ते हैं. इसलिए मेरा मानना है कि क़ानून में बदलाव के साथ-साथ, समय के साथ तकनीक में भी तालमेल बिठाया जाना चाहिए.”

डिजिटल न्यूज़

क्या है प्रस्तावित क़ानून में

इस क़ानून का विवरण अभी सामने नहीं आया है लेकिन बताया जा रहा है कि ये साल 2019 में तैयार किए गए अधिनियम को दोबारा जीवित करने की ही कोशिश है. केंद्र सरकार ने 2019 में बिल का एक मसौदा तैयार किया था जिसमें ‘डिजिटल मीडिया पर समाचार’ को “डिजिटल फॉर्मेट में समाचार” के रूप में परिभाषित किया गया था.

डिजिटल समाचारों का मतलब ऐसा न्यूज़ कंटेंट जिसे इंटरनेट के ज़रिए कंप्यूटर या अन्य डिवाइस पर प्रसारित किया जा सकता है. इसमें टेक्स्ट, ऑडियो, वीडियो और ग्राफिक्स सभी शामिल हैं.

इस नए बिल में डिजिटल न्यूज़ प्रकाशकों को, प्रेस रजिस्ट्रार जनरल के पास पंजीकरण कराना होगा, प्रेस रजिस्ट्रार जनरल के पास, नियमों के उल्लंघन की स्थिति में, विभिन्न प्रकाशनों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने का अधिकार होगा.

प्रेस रजिस्ट्रार जनरल, पंजीकरण को निलंबित या रद्द कर सकता है और इसके अलावा क़ानून में दंड का प्रावधान भी है.

अधिकारियों के अनुसार, भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष के साथ-साथ, एक अपीलीय बोर्ड की योजना भी बनाई गई है.

अख़बार

आरएनआई का गठन और समाचार पत्रों का रजिस्ट्रेशन

1867 के पुराने अधिनियम का एक मुख्य उद्देश्य भारत में प्रकाशित होने वाले समाचार पत्रों, पत्रिकाओं और पुस्तकों का रिकॉर्ड रखना था. साल 1955 में, इस क़ानून को, भारतीय समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार ऑफ़ न्यूज़पेपर्स फॉर इंडिया (आरएनआई) की स्थापना के लिए संशोधित किया गया था.

दिलचस्प बात ये है कि आरएनआई के गठन के वक़्त उस समय की नेहरू सरकार पर भी अख़बारों को नियंत्रित करने के आरोप लगे थे.

आरएनआई के पास अख़बारों को रजिस्टर करने, इससे इनकार करने, इसके रजिस्ट्रेशन को स्थगित करने का पूरा अधिकार था.

ख़ुद संपादक रहे चुके डा. जगदीश द्विवेदी कहते हैं कि आपातकाल के अलावा उन्हें सरकारी नियंत्रण या रोकटोक का कभी सामना नहीं करना पड़ा.

वे कहते हैं कि”मुझे ऐसी स्थिति याद नहीं है उस समय की सरकार या सत्ताधारी दल ने कभी भी एक समाचार पत्र पर दबाव डालने के लिए पंजीकरण और पंजीकरण अधिनियम की अपनी शक्ति का प्रयोग किया हो. अगर कभी किसी सरकार ने किसी समाचार संगठन को दबाने के लिए पंजीकरण क़ानूनों का इस्तेमाल करने की कोशिश की होती तो मुझे यकीन है कि न्यायपालिका इसके ख़िलाफ़ खड़ी हो जाती.”

वे कहते हैं कि लोगों को देश की संस्थाओं पर भरोसा रखना चाहिए, “जब भी सरकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने के बारे में सोचा है, तब सुप्रीम कोर्ट जैसे देश में ऐसे संस्थान हैं, जिन्होंने हमारे अधिकारों की रक्षा की है. हम एक लोकतंत्र हैं. चिंता की क्या बात है. हमें अपने संस्थानों में विश्वास रखना चाहिए.”

अख़बारों के बारे में तो विंध्यलीडर समाचार पत्र के सह सम्पादक ब्रजेश पाठक भी डा. जगदीश द्विवेदी की बात से सहमत हैं, वे कहते हैं कि यह सही है कि “किसी बड़े अख़बार पर कोई हमला नहीं हुआ, न कांग्रेस के ज़माने में और न ही मोदी सरकार के ज़माने में. इस नए क़ानून के अंतर्गत एक तरह से न्यूज़ पोर्टल सरकार की नज़र में क़ानूनी तौर पर अब जवाबदेह हो जायेंगे. उस पर चौकीदारी तो कल भी थी और आज भी है.”

अख़बार

डिजिटल मीडिया बनाम पारंपरिक मीडिया

पिछले दो दशकों में डिजिटल मीडिया का काफ़ी विस्तार हुआ है. भारत में न्यूज़क्लिक, द न्यूज़ मिनट, वायर, स्क्रॉल ऑल्ट न्यूज़ और विंध्यलीडर डॉट कॉम जैसे संस्थान अस्तित्व में आए हैं जो स्वतंत्र हैं. इन्हें समाचार पत्रों की सरकारी विज्ञापन नहीं मिलते हैं. ये चंदे और दान पर चलते हैं. इनमें से अधिकांश पोर्टल पत्रकारों ने ही स्थापित किए हैं.

फोटो जर्नलिस्ट आशीष अग्रवाल कहते हैं कि पारंपरिक मीडिया कई चीजों के लिए केंद्र सरकार पर निर्भर है.

उदाहरण के लिए, मोदी सरकार प्रति वर्ष 1,200 करोड़ रुपये (प्रति माह 100 करोड़ रुपये) विज्ञापन पर खर्च करती है. केंद्रीय पब्लिक सेक्टर की इकाइयाँ 1,000 करोड़ रुपये या उससे अधिक खर्च करती हैं.

इसलिए लगभग 200 करोड़ रुपये हर महीने मीडिया को दिए जाते हैं, जो एक बहुत बड़ी राशि है. विभिन्न राज्य सरकारों के विज्ञापनों का बजट इससे अलग है.

नए अधिनियम में डिजिटल न्यूज़ को शामिल करने की बात तो है. लेकिन सोशल मीडिया प्लेटफार्म भी न्यूज़ प्रकाशित करते हैं. उनका क्या?

मोदी सरकार ने किसी नए क़ानून के बिना ही इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को विनियमित करने के लिए सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 को लागू किया है.

पत्रकार रवींद्र केशरी का मानना है कि चाहे डिजिटल न्यूज़ पोर्टल हो या सोशल मीडिया प्लेटफार्म, इन सब की समाज के प्रति ज़िम्मेदारी बनती है जिससे वो दूर भाग रहा है.

वे कहते हैं, “देखिए सोशल मीडिया पर पिछले पांच-छह सालों में क्या-क्या हुआ है. मैं सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को अपने देश में होने वाली बहुत सारी हिंसा का ज़िम्मेदार मानता हूँ. व्हाट्सएप आदि ने इस देश में सामाजिक सौहार्द बिगाड़कर और हिंसा भड़काकर जो कहर ढाया है, उस पर यक़ीन नहीं होता. जब सरकार ने सोशल मीडिया के संबंध में 2021 में नियम लाने का फ़ैसला किया तो मैं उन लोगों में से एक था जिन्होंने पूरे दिल से इसका समर्थन किया.”

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