Saturday, February 4, 2023
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एक निजी अस्पताल में स्वास्थ्य विभाग की छापेमारी में मिली कई कमियों के बाद अस्पताल सीज कर तीन दिन में जबाब देने की नोटिस जारी

सोनभद्र। वर्तमान समय में जिलाधिकारी सोनभद्र के निर्देश के क्रम में जिले में मानक विहीन चल रहे निजी अस्पतालों के खिलाफ स्वास्थ्य विभाग की कार्यवाही जारी है।इसी क्रम में आज स्वास्थ्य विभाग को सूचना मिली कि राबर्ट्सगंज शहर से सटे बरेला शिव मंदिर के पास संचालित एक हॉस्पिटल में पिछले कुछ समय से बिना डाक्टरों के ही अप्रशिक्षित बेरोजगार युवाओं द्वारा मरीजो का इलाज किया जा रहा है।

उक्त सूचना के आधार पर स्वास्थ्य विभाग से डॉ डी के चतुर्वेदी प्रभारी चिकित्सा अधिकारी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र केकराही अपनी टीम के साथ जांच हेतु पहुँच गए।जांच के दौरान वहां एक नवजात शिशु का इलाज चलते हुए पाए जाने तथा वहाँ मिले अस्पताल कर्मियों द्वारा यह न बता पाने की उक्त नवजात शिशु के माता पिता कहाँ हैं तथा उक्त नवजात शिशु का क्या इलाज किया जा रहा है तथा न ही उक्त नवजात शिशु की भर्ती पर्ची या अस्पताल में कोई रिकॉर्ड पाए जाने के कारण सूचना जिला प्रोबेशन ऑफिस को दी गयी जिसके बाद प्रोबेशन विभाग की टीम भी वहां पहुंच गई।

यहां आपको यह भी बताते चलें कि उक्त अस्पताल में एक अन्य मरीज जिसकी एक दिन पूर्व ऑपरेशन से बच्चा पैदा हुआ था,भी मिली जबकि अस्पताल में चारों तरफ यह लिख कर सूचना डिस्प्ले की गई थी कि 05 तारीख से 15 तारीख तक अस्पताल में डॉक्टर मौजूद नहीं रहेंगे।अब ऐसे में सवाल यह था कि उक्त महिला का ऑपरेशन किस डॉक्टर ने किया था और यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि ऑपरेशन के बाद किस डॉक्टर के भरोसे उक्त महिला को उक्त अस्पताल में रखा गया था।इस बात का जबाब उक्त हॉस्पिटल में मौजूद किसी भी कर्मचारी के पास नहीं था।

फिलहाल वहाँ जांच करने पहुंची प्रोबेशन विभाग व स्वास्थ्य विभाग की टीम ने उक्त हॉस्पिटल में ताला लगाकर अस्पताल संचालक को तीन दिन में अपना पक्ष प्रस्तुत करने की नोटिस दे दी तथा उक्त हॉस्पिटल में मौजूद मरीजो के समुचित इलाज हेतु उन्हें एम्बुलेंस द्वारा जिला चिकित्सालय भेज दिया।

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि जब जिला मुख्यालय पर इस तरह बिना प्रशिक्षित डाक्टरों व पैरा मेडिकल स्टाफ के मरीजों का इलाज किया जा रहा है जहाँ स्वयं मुख्यचिकित्साधिकारी व ऐसे हॉस्पिटलों की जांच हेतु गठित स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी बैठते हैं तो आप स्वंय सोच सकते हैं कि जिले के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में क्या हाल होगा। यहाँ आपको बताते चलें कि जिले में ऐसे तमाम अस्पताल संचालित हैं जिनके बोर्ड पर प्रदर्शित बड़े बड़े डॉक्टरों के नाम केवल या तो मुख्यचिकित्साधिकारी कार्यालय में रजिस्ट्रेशन की फाइल में होते हैं या फिर उन हॉस्पिटलों के बोर्ड पर ,वास्तव में उक्त डॉक्टर उन अस्पतालों में कभी इलाज हेतु उपलब्ध नहीं होते हैं।यदि ऐसा नही होता तो आये दिन जिले भर से यह खबर अक्सर नहीं आती रहती की आज फलाँ अस्पताल में लापरवाही की वजह से अमुक मरीज की मौत हो गयी।

इससे एक बात तो साफ है कि निजी अस्पतालों व झोलाछाप चिकित्सकों के जांच हेतु गठित स्वास्थ्य विभाग की टीम व नोडल अफसर अपना काम ठीक से शायद नहीं कर पा रहे हैं।क्योंकि यदि उक्त टीम अपना काम ठीक से करती तो शायद स्थिति इतनी गम्भीर न होती कि जिस अस्पताल में यह सूचना डिसप्ले हो कि यहां डॉक्टर नही हैं वहां सिजेरियन बच्चे पैदा कराए जाते ?

सवाल तो यह भी है कि आखिर जिले में संचालित निजी अस्पताल संचालक किसके शह पर अथवा किसके दम पर दिन रात विभागीय नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए संचालित हैं।आखिर जिन अधिकारियों के कंधों पर विभागीय नियमों को पालन कराने की जिम्मेदारी है वह लोग ऐसे अस्पतालों की तरफ से क्यूँ आंख मूंद रखी है ? कब तक विभागीय उदासीनता के कारण इस तरह से मानक विहीन अस्पतालों में निरीह व गरीब बिना पढ़े लिखे गरीब लोगों का अप्रशिक्षित लोगों से इलाज के बहाने धनादोहन किया जाता रहेगा ?




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