Tuesday, July 5, 2022
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राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी व अधिकारियों के उपनिवेशवादी नीति का परिणाम है बीमारी से मकरा सेंदुर में मरते मासूम आदिवासी

म्योरपुर से विंध्यलीडर की खास रपट

मकरा में 15 मासूमों सहित 36 की मौत राजधानी तक हड़कंप मचाए हुए है पर कार्रवाई के नाम पर अब तक कुछ भी सामने नहीं आया है। जहां तक शासन प्रशासन की बात है तो अभी तक मामला मौत के आंकड़े पर ही टिका हुआ है। सत्ताधारी दल के जिले से एकमात्र आदिवासी विधायक जिन्हें आदिवासियों के वोट बटोरने के लिए अभी हाल ही में मंन्त्री पद से भी नवाजा गया है,उन्हें भी सरकारी तंत्र द्वारा दिए जा रहे मौत के आंकड़े पर भरोसा नहीं है शायद इसी लिए पत्रकारों द्वारा किये गए एक सवाल के जबाब में उन्होंने कहा कि कितनी मौत हुई है यह पार्टी कार्यकर्ताओं द्वारा जांच करवा कर बताएंगे।यहाँ यह बात भी विचारणीय है कि जब सरकार के अंग मंन्त्री को ही सोनभद्र जिला प्रशासन व स्वास्थ्य विभाग के मौत के आंकड़े पर भरोसा नहीं है तो सामान्य जन व मीडिया जगत के लोग इन सरकारी आंकड़ों पर विश्वास क्यों कर लें ? फिलहाल सरकारी अमला अपनी पूंछ में लगी इस आग पर काबू पाने के लिए जो सबसे अच्छा रास्ता होता है कि अपनी पूंछ बचाने के लिए दूसरे की पूंछ आगे कर दो ,उसी में लगा है।

अर्थात आदिवासियों की हो रही मौत के असली वजहों व जिम्मेदार विभाग की जगह उन वजहों पर मीडिया व सामान्य जन का ध्यान खींचना जो मौतों के लिए सीधे जिम्मेदार न होकर मौत के अन्य कारणों में बदल जाये, और सोनभद्र जिला प्रशासन अपने इस कार्य मे फिलहाल सफल होता दिख रहा है। जिला प्रशासन की नई कहानी में मकरा सिंदूर में धड़ाधड़ हो रही मौतों के लिए स्वास्थ्य विभाग की लचर कार्यप्रणाली जिम्मेदार न होकर उक्त गांव में साफ सफाई का न होना व स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति न होना है। फिलहाल रिहन्द डैम के आस पास व किनारे पर बसे गांवो का भूगर्भ जल पीने योग्य नहीं है यह तो पिछले तीन साल से सरकार व उनके नुमाइंदों को पता है फिर भी वहां के लोग यदि वही प्राकृतिक प्रदूषित पानी पीने को विवश हैं तो आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन है ? जबकि पिछले पाँच वर्ष से जीरो टॉलरेंस की भाजपा सरकार है।

यहां आपको बताते चलें कि प्रदूषित पेयजल और मलेरिया के चलते अब तक हुई तीन दर्जन से अधिक मौतों को लेकर सुर्खियों में आये सेंदूर मकरा ग्राम पंचायत का जहरीला पानी लंबे समय से मानव स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बना हुआ है। लैब टेस्टिंग में यहां फ्लोराइड और आयरन की मात्रा मानक से अधिक पाए जाने की पुष्टि तो हुई ही है, नाइट्रेट की मात्रा भी मानक से दोगुने से भी अधिक पाए जाने के बाद हड़कंप की स्थिति उत्पन्न हो गई है। हालात को देखते हुए मकरा में सौर ऊर्जा आधारित रिमूवल प्लांट युक्त पेयजल परियोजना को स्थापित कराने की संस्तुति की गई है।

इतनी बड़ी संख्या में हुई मौतों के बाद यहां के पानी की जल निगम के लैब में मंगलवार को कराई गई टेस्टिंग में कई जहरीले रासायनिक तत्वों की मात्रा मानक से अधिक होने के प्रमाण मिले हैं। प्राथमिक पाठशाला मकरा, मदनिया टोला बढ़िया टोला मदैनिया टोला खास स्थित हैंडपंपों से उठाए गए पानी के नमूनों में आयरन की मात्रा मानक प्रति लीटर एक मिलीग्राम (पीपीएम) के मुकाबले 11 मिलीग्राम (10.77) के करीब पाई गई है।

इसी तरह मदैनिया टोला खास से लिए गए नमूने के लैब परीक्षण में फ्लोराइड-आयरन के साथ ही, बड़ों के साथ ही बच्चों के लिए भी बेहद खतरनाक नाइट्रेट की मात्रा मानक 45 पीपीएम से काफी अधिक 105.46 पाई गई है। मकरा खास टोले में भी नाइट्रेट की मात्रा 99.08 तक मिली है। मदैनिया टोला में आयरन के साथ ही फ्लोराइड की अधिकता पाई गई है। प्रदूषित पानी से होने वाली बीमारियों के विशेषज्ञ बताते हैं कि फ्लोराइड की अधिकता वाले पानी के सेवन से जहां कंकालीय फ्लोरोसिस (हड्डियों के टेढ़ी-मेढ़ी होने की बीमारी) का खतरा बढ़ जाता है।वही पीने वाले पानी में आयरन की अधिकता को एनीमिया, यकृत रोग, अल्जाइमर, पार्किसंस, मल्टीपल स्केलेरोसिस जैसी गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण माना जाता है छह महीने से कम उम्र के शिशुओं में संभावित रूप से घातक रक्त विकार का कारण माना जाता है। इसी तरह नाइट्रेट को कैंसर के साथ ही मेथेमोग्लोबिनेमिया यानी “ब्लू-बेबी” सिंड्रोम का जनक कहा जाता है। इसमें रक्त के ऑक्सीजन वहन क्षमता में कमी आती है।

उधर, सीएमओ डा. नेम सिंह ने भी जल निगम की टेस्टिंग में मकरा का पानी प्रदूषित पाए जाने की पुष्टि की है बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि ऐसे पानी के सेवन से फेफड़े में सूजन और प्रतिरोधक क्षमता में कमी आती है। लंबे समय तक सेवन से मृत्यु की भी स्थिति बन सकती है। इसके रोकथाम के लिए हर संभव उपाय अमल में लाए जा रहे हैं। आगे उन्होंने बताया कि जिलाप्रशासन के सहयोग से उक्त गांवो की साफ सफाई के साथ ही शुद्ध पेयजल की आपूर्ति टैंकर द्वारा की जा रही है तथा मकरा सिंदूर गांव में लगातार मेडिकल कैम्प कर लोगों की जांच की जा रही है तथा जिन लोगों में इंफेक्शन मिल रहा है उन्हें तत्काल मेडिकल सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है।फिलहाल वहाँ हालात को सामान्य करने हेतु जो भी जरूरी है वह सारे उपाय किये जा रहे हैं।सवाल तो फिर भी वही है कि आखिर इतनी मौतों के बाद कुम्भकर्णी नींद से जगे स्वास्थ्य विभाग द्वारा यदि समय रहते यह सारे उपाय किये गए होते तो शायद इतनी बड़ी मात्रा में हुई मौतों की संख्या में कमी आ गयी होती।अब वही घिस पीटा राग प्रशासन द्वारा अलापा जा रहा है कि इतनी बड़ी मात्रा में मौतों के जिम्मेदार फलां नहीं फलां हैं यह कन्फ्यूजन उत्पन्न कर असली जिम्मेदार को बचाने के लिए किसी ऐसे पर कार्यवाही कर के खाली हो जाओ जिसकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं थी ।प्रशासन को इस तरह के कार्य से दो तरह से लाभ होता है, प्रथम तो यह कि दिखावे के लिए कार्यवाही भी हो जाती है जिससे लोगों में फैल रहे आक्रोश को कम किया जाता है, दूसरे वह जिस पर कार्यवाही की जाती है वह या तो न्यायालय से अथवा उच्चधिकारियों के यहाँ से बरी हो जाता है क्योंकि वह कर्मचारी उस कार्य के लिए जिम्मेवार होता ही नहीं।इस तरह से प्रशासन दिखावे के लिए कार्यवाही भी कर लेता है और अपने लोगों को बचा भी लेता है।

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