Wednesday, April 24, 2024
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बिजली संकट के लिए सरकार जिम्मेदार- आईपीएफ

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मुख्यमंत्री अति शीघ्र कर्मचारियों से वार्ता कर समस्याओं का समाधान करें


लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली कर्मचारियों की हड़ताल के कारण पैदा हुए बिजली संकट के लिए सरकार का हठवादी और तानाशाही रवैया जिम्मेदार है। यदि सरकार कर्मचारियों के साथ हुए समझौते को लागू कर देती तो प्रदेश की जनता को इन परेशानियों का सामना ना करना पड़ता, इसलिए सीएम को तत्काल कर्मचारियों से वार्ता कर समझौते को लागू करना चाहिए और उनकी मांगों को पूरा करना चाहिए। यह बातें आज प्रेस को जारी अपने बयान में ऑल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय अध्यक्ष एस.आर.दारापुरी ने कही। उन्होंने कहा कि प्रदेश सरकार की एस्मा लगाने, संविदा कर्मचारियों समेत अभियंताओं को बर्खास्त व निलंबित करने, कर्मचारियों को धमकी देने और उनके ऊपर एफआईआर दर्ज करने जैसी दमनात्मक कार्रवाहियां बिजली संकट को और भी बढ़ाने का काम करेगी।

उन्होंने कहा की सरकार को प्रदेश की जनता को बताना चाहिए की जब उसने कर्मचारियों से 3 दिसंबर को हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बाद समझौता किया तो उस समझौते को लागू करने में उसे क्या दिक्कत है ? लोकतंत्र में कोई भी सरकार अपने किए वादे और समझौते से पीछे नहीं हट सकती। ऐसा करना दरअसल लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। उन्होंने कहा कि इन्वेस्टर सम्मिट में सरकार ने उत्पादन निगम के अनपरा व ओबरा में नई इकाइयां निर्मित करने का समझौता एनटीपीसी के साथ किया है। जबकि भाजपा की केंद्र सरकार एनटीपीसी का निजीकरण करने की नीति पर काम कर रही है, ऐसे में कर्मचारियों का यह कहना उचित है कि सरकार निजीकरण की नीति के तहत ही अनपरा व ओबरा की नई इकाइयों को एनटीपीसी को दे रही है।

उन्होंने कहा कि विद्युत संशोधन विधेयक 2022 लाना और कुछ नहीं बिजली क्षेत्र का निजीकरण करना है और आम जनता व किसानों को महंगी बिजली देना है। उत्तर प्रदेश में सरकार बिजली क्षेत्र में कारपोरेट कल्चर स्थापित कर रही है। बिजली कर्मचारियों और अभियंताओं पर काम का अत्यधिक दबाव डाला जा रहा है। जबकि इसके अनुरूप इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन पावर में कोई वृद्धि नहीं की जा रही है। प्रदेश में बिजली विभाग में हजारों पद खाली हैं, स्थाई कामों पर ठेका मजदूरों से काम कराया जा रहा है और उन्हें बेहद कम वेतन दिया जा रहा है व उनकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं है। इतना ही नहीं सरकार बिजली की कीमतों में भी वृद्धि करने का प्रस्ताव नियामक आयोग में ले जा चुकी है और आने वाले समय में इसमें वृद्धि करना चाहती है, जिससे आम जनता को इस बेइंतहा महंगाई में और भी संकट झेलना पड़ेगा।सब मिलाजुला कर कहा जाए तो सरकार व मुख्यमंत्री को अपने निजीकरण की नीतियों को वापस लेना चाहिए और निजीकरण के विरुद्ध लड़ रहे कर्मचारियों से वार्ता कर उनकी समस्याओं का समाधान करना चाहिए।

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