Saturday, February 4, 2023
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उत्तरप्रदेश में सूखे की दस्तक: मानसून के इंतजार में पथराने लगी किसानों की आंखे:अन्नदाताओं का डिगने लगा भरोशा

मौसम विज्ञानियों ने कुछ महीने पहले किसानों को जो भरोसा दिया था वह अब जैसे जैसे समय गुजर रहा है डिगने लगा है। आषाढ़ में बारिश न होने से पूर्वांचल के किसानों की आस्था खंडित होने लगी है और बुंदेलखंड में अन्नदाता का भरोसा डिगने लगा है। बारिश के आसार दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रहे हैं।बादलजिस तरह से बिना बरसे ही निकल जा रहे हैं उसे देख अन्नदाताओं के माथे पर अब बल पड़ने लगे हैं।


उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल व बुंदेलखंड में किसानों की बूढ़ी और अनुभवी आंखें पथराने लगी हैं। वे आंखें, जिन्हें लहलहाते खेतों को देखने की आदत थी। वो बूढ़ी देह, जिन्हें खेतों की मेड़ पर हर बरसात में रपट जाने की आदत थी, मानसून की बेरुखी के चलते वो उल्लास और उमंगविहीन हो गई हैं। वजह, समूचे पूर्वांचल और बुंदेलखंड में धान की रोपाई और खरीफ की फसलों की बुवाई नहीं हो पाई है। खरीफ की जो फसलें पहले बोई गई थीं, वह भी सूखकर दरकने लगी हैं। पिछले साल काले-कजरारे बादलों ने आषाढ़ में झमाझम बारिश की थी और अबकी इंतजार के बाद यदा-कदा आ तो रहे हैं, लेकिन ललचाकर चले जा रहे हैं।

बादलों की बेरुखी से यूपी में रोपी गई धान की 25 फीसदी फसल खराब हो चुकी है। राज्य के कुल 75 जिलों में से 67 ऐसे हैं, जहां बारिश न होने से स्थिति लगातार बिगड़ती दिखाई दे रही है। पूर्वांचल का हाल तो सूखे की मार झेलने वाले बुंदेलखंड से भी बदतर है। इस इलाके में कुछ ऐसी ही स्थिति साल 2002, 2004 और 2009 में भी पैदा हुई थी। उस समय अलनीनो को असर से बारिश में कमी दर्ज की गई थी। साल 2012 में भी मानसून ने किसानों को तगड़ा धोखा दिया था। दशकों बाद ऐसी स्थिति आई है जब पूर्वांचल और बुंदेलखंड में आषाढ़ महीने में बादलों ने किसानों को धोखा दिया है।

प्रयागराज मंडल के संयुक्त निदेशक रमेश चंद्र मौर्य पूर्वांचल के कई जिलों में काम कर चुके हैं। वह कहते हैं, “बारिश न होने से अभी तक धान की मुख्य फसल ही नहीं रोपी जा सकी है। जिन किसानों ने बारिश की उम्मीद में उर्द, मूंग और मक्के की खेती की है, वह फसलें भी सूख रही हैं। दिन का तापमान 38 से 40 डिग्री के बीच है। जिन लोगों ने धान की रोपाई किसी तरह से कर रखी है, वह झुलस रही है। प्रयागराज मंडल में करीब 83 फीसदी निजी साधनों से खेती होती है। हालांकि जब तक मानसूनी बारिश नहीं होगी, तब तक निजी संसाधन वाली फसलें भी बेदम ही रहेंगी। मिर्जापुर और सोनभद्र में 60 से 70 फीसदी खेती मानसूनी बारिश के भरोसे होती है। दोनों जिलों के बांध लबालब भर जाते हैं, तभी खरीफ और रबी की फसलों की सिंचाई हो पाती है। दोनों पहाड़ी जिलों में खेतों में बड़े-बड़े दर्रे नजर आ रहे हैं। किसानों का हाल यह है कि वो दिन-रात आसमान में टकटकी लगाए बादलों का इंतजार कर रहे हैं। यह इस इल के में जब बारिश होती है तभी किसान नर्सरी डाल पाते हैं।”

श्री मौर्य कहते हैं, “चंदौली, गाजीपुर और बनारस में 50 फीसदी खेतों के लिए सिंचाई की सुविधा नहीं है। मानसूनी बारिश न होने से बहुत से किसानों ने अभी तक नर्सरी नहीं डाली है। खासतौर पर उन इलाकों में जहां किसान बारिश पर निर्भर रहते हैं। जिन किसानों ने पंपसेट अथवा ट्यूबवेल से नर्सरी डाल रखी है वह तैयार हो चुकी है, लेकिन रोपाई लायक बारिश नहीं हो सकी है। पूर्वांचल के ज्यादातर इलाकों में धान के साथ-साथ उड़द, मूंग, मक्का और अरहर की बुआई में विलंब हो रहा है। कुछ किसानों ने मई महीने में ढैंचे की बुआई कर रखी थी, लेकिन बारिश न होने से उसकी पलटाई संभव नहीं हो पा रही है। धान की नर्सरी अब 25 से 28 दिन पुरानी हो चली है और रोपाई नहीं हुई तो उसका असर उत्पादकता पर पड़ेगा। पहले दस जुलाई तक अरहर और मक्के की बुआई हो जाया करती थी मगर इस बार मानसून ने दगा दे दिया। डीजल महंगा होने की वजह से सिंचाई का व्यय भार किसान वहन नहीं कर पा रहे हैं।”

वाराणसी के कृषि उप निदेशक अनिल कुमार सिंह किसानों को सलाह देते हुए कहते हैं, “मौजूदा हालात में धान की रोपाई करने से ज्यादा लाभ नहीं होने वाला। एक पखवाड़े तक बारिश नहीं होती है तो दिक्कत ज्यादा होगी। अगर धान की रोपाई नहीं हो पा रही है तो बाजरा, अरहर, उर्द, मक्का, ज्वार की खेती की तैयारी कर देनी चाहिए। जिन लोगों ने ट्यूबवेल से धान की रोपाई की है उसमें कम पानी लगाएं। साथ ही यूरिया का छिड़काव कम कर दें। मौसम अनुकूल होने पर ही उर्वरकों का इस्तेमाल करें। धान के बेहन में सिंचाई सुबह-शाम करें, अन्यथा उसे बचा पाना मुश्किल है। बनारस में अभी तक सिर्फ 12 हजार हेक्टेयर में खरीफ की फसलों की खेती की जा सकी है, जबकि लक्ष्य 68 हजार का है। इस जिले में खरीफ की मुख्य फसल धान है।”

सिर्फ पूर्वांचल ही नहीं, बुंदेलखंड इलाके में स्थिति काफी भयावह है। बांदा, चित्रकूट, महोबा और हमीरपुर में स्थिति गंभीर है। ये वो जिले हैं जहां सिर्फ वर्षा के भरोसे ही समूची खरीफ की खेती होती है। बांदा के उप निदेशक (कृषि रक्षा) डा.एलबी यादव कहते हैं, “चित्रकूट, बांदा, महोबा और हमीरपुर में अभी तक सिर्फ 20 मिली मीटर ही बारिश हो सकी है। सर्वाधिक बारिश महोबा में हुई है। पिछले साल इसी अवधि में 120 मिली बारिश हुई थी। फसल बोने की बात तो दूर, इस इलाके के किसानों ने अभी खेतों की ओर रुख ही नहीं किया है।”

“बुंदेलखंड के सभी जिलों में मानसूनी खेती (बारिश आधारित) के रूप में मुख्य रूप से ज्वार, बाजरा, तिल आदि की पैदावार होती है। बारिश के उम्मीद में जिन किसानों ने उर्द और मूंग की खेती कर दी थी वह सूखने की कगार पर है। यहां खेती की कौन कहे, आषाढ़ में यहां पीने के पानी का जबरदस्त संकट बरकरार है। बांदा और हमीरपुर जिले में स्थिति काफी विस्फोटक हो गई है। अगर समय से मानसूनी बारिश नहीं हुई तो इस इलाके के किसानों को भीषण संकट से जूझना पड़ सकता है। तब किसानों की मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी, क्योंकि इस इलाके के खेत की मिट्टी भी अलग तरह की है। बारिश खत्म होते ही पानी का संकट गहराना शुरू हो जाता है।”

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक बुंदेलखंड के हमीरपुर जिले के भरुआ सुमेरपुर इलाके में डेढ़ दशक पहले कुछ इसी तरह के हालात बने थे। उस समय खरीफ की फसलें बोने के बाद सूख गई थीं। जो थोड़ी फसलें बची भी थीं, वह कटाई से पहले ही खेतों में सूखकर कांटा हो गई थीं। उस साल हमीरपुर जिले के 12 किसान फांसी के फंदे पर झूल गए थे। साल 2007 में भी बुंदेलखंड में भीषण सूखा पड़ा था, जो तिल की फसलों को लील गया था। उर्द, अरहर, ज्वार, मूंग की फसलें अक्टूबर में कटने से पहले ही पानी न मिलने के कारण सूख गई थीं। कर्ज को बोझ तले दबे कई किसानों ने सुसाइड कर लिया था। आत्महत्या की ज्यादातर घटनाएं पचकुरा बुजुर्ग, पत्योरा, टेढ़ा, चंदपुरवा बुजुर्ग, इंगोहटा, विदोखर और कलौलीजार में हुई थीं।

बुंदेलखंड में मुख्य रूप से ज्वार, अरहर, मूंग, तिल, उड़द की फसलें होती हैं। हमीरपुर के प्रगतिशील किसान संतोष सिंह और राधेश्याम तिवारी कहते हैं, अगर 15 जुलाई तक बारिश बारिश नहीं होती है तो खरीफ की खेती का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। दशकों बाद ऐसा समय आया है जब आषाढ़ में मानसूनी बारिश नहीं हुई है। हालात ऐसे ही रहे तो किसान खरीफ की फसल बोने से वंचित रह जाएंगे। हमीरपुर से मिलती-जुलती तस्वीर बुंदेलखंड के सभी जिलों में है। मानसून मेहरबान नहीं हुआ तो किसानों और मजदूरों के सामने भूखों मरने की नौबत पैदा हो जाएगी।

बारिश का आंकड़ा 09 जुलाई 22 तक (मिमी में)

अंचल सामान्य बारिश हुई बारिश . फीसद

पश्चिमी यूपी 146.2 55.7 38.10



मध्य यूपी 166.4 63.4 38.00

बुन्देलखंड 153.4 55.6 37.50

पूर्वांचल 213.5 80.0 37.50

संपूर्ण यूपी 176.5 65.8 37.30




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