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देश में आपदा के हालात चल रहे है, इस स्थिति में लोग ना जाने कैसे-कैसे अपने व अपने परिवार का पेट भर रहे है, उस स्थिति पर  एक बहुत ही मार्मिक कहानी प्रस्तुत है।
राजू- नमस्कार जी क्या आप आपदा कंट्रोल रूम से बोल रहे हैं। 
ऑफिसर- हां जी बोलिए आपदा कंट्रोल रूम से ही बोल रहे है।
राजू- लड़खड़ाती जुबान से, साहब हमारे घर के पास झुग्गियों में कुछ बेहद लाचार मजबूर किस्मत के मारें मजदूर लोग रहते है, जो की अपना राशन खत्म होने के कारण कई दिनों से भूख से तड़प रहे है, साहब इन बेचारों की तुरंत मदद करवा दो, उनकी जान बचा लो साहब। 
ऑफिसर- हड़काते हुए, उन लोगों ने मदद मांगने के लिए फोन क्यों नहीं किया और तुम क्यों कर रहे हो। 

राजू- साहब कृपया गुस्सा नहीं हो वो बेचारे भूख से बहुत परेशान है वो बात करने की स्थिति में नहीं है।
ऑफिसर- ठीक है एड्रेस बताओं कहा मदद पहुंचवानी है और वो कितने लोग है।
राजू- जी साहब लिखों मकान नबंर 1008 सेक्टर 27 सिटी सेंटर और यहाँ 2 बच्चे व 4 बड़े लोग हैं।
ऑफिसर- क्या तेरा दिमाग खराब हो गया है, अभी तो झुग्गी बता रहा था और अब मकान का पता लिखवा रहा है, वैसे भी इस सेक्टर में तो सब पैसे वाली पार्टी रहती है।
राजू- जी साहब दिमाग भी खराब है और समय भी व किस्मत भी आजकल खराब चल रही है, आप सब कुछ ठीक कह रहे है कि इस सेक्टर में सब पैसे वाले लोग रहते है, लेकिन साहब झुग्गी का कोई नंबर तो होता नहीं और अगर आपकी टीम झुग्गी ढूंढने में इधर-उधर भटकती रही और उनको मदद देर से पहुंची तो उन मुसीबत के मारे दुखियारों पर भूख के चलते पहाड़ टूट सकता है साहब, उनकी जान जा सकती है, इसलिए मैंने अपने घर का पता लिखवा दिया है साहब। 

इसे भी पढ़ें: कोरोना में सब बंद है (व्यंग्य)ऑफिसर- अच्छा तुम्हारी बातों से लगता है कि उन लोगों की बहुत गंभीर स्थिति है तो चलो ठीक है हम तुरंत मदद भिजवा रहे है, लेकिन तुमको जरा भी इंसान व इंसानियत की फिक्र नहीं है, एक टाइम रोटी बनवाकर तुम भी उन बेचारों को खिलवा सकते थे तुम्हारा कुछ बिगड़ नहीं जाता, खैर मैं तुरंत मदद करने वाली जिला राहत टीम को आपके पास भेज रहा हूँ वो आधे घंटे में तुम्हारे पास उन लोगों के लिए खाना व एक माह का राशन लेकर पहुंच रहे हैं। 
राजू- बहुत-बहुत धन्यवाद साहब मैं आपका हमेशा बहुत एहसानमंद रहूंगा, वो मजबूर व लाचर भूखे लोग आपको हमेशा दिल से दुआ देंगे साहब।
ऑफिसर- ठीक है मैने टीम के वरिष्ठ अधिकारी विजय की ड्यूटी लगा दी इस काम के लिए वो खाना व राशन लेकर निकलने वाला है, तुम उनका इंतजार करना। इतने इन लोगों ढ़ाढस बनाकर रखना।
राजू- जी साहब मैं उनके इंतजार में बैठा हूँ और आप चिंता ना करें मैं पिछले कई दिनों से इन लोगों का ढ़ाढस बनाकर रख रहा हूँ।
लगभग आधें घंटे बाद राजू के मोबाइल की घंटी बजती है, मैं जिला राहत टीम से विजय बोल रहा हूँ, घर के बाहर आ जाओं।
राजू- जी साहब में अभी आया, वह घर से बाहर निकला तो उसने देखा एक जीप में दो लोग उसका खाना व सामान लेकर इंतजार कर रहे हैं, वो उनके पास घबराते हुए पहुंचा और बोला साहब नमस्कार में राजू हूँ।
विजय- ठीक है बताओं वो कौन सी झुग्गी है जिनके लोगों को खाना व राशन की मदद करनी है।
राजू- जी आप क्यों परेशान होते हैं, आप खाना व सामना मुझे दे दो, मैं उनकी झुग्गी पर अभी खुद ही पहुंचा दुंगा।
विजय- नहीं मैं खुद देकर आऊंगा मेरे साहब का आदेश है कि उन बेचारे मुसीबत के मारे लोगों से मिलकर जरूर आना और उनकी कोई जरूरत हो उसको पूछ कर आना, तुम मुझको जल्दी उनसे मिलवाओं जिससे में समय से अपना काम करके, किसी दूसरे व्यक्ति की मदद करने जाऊं।
राजू- पसीने से तरबतर होकर घबराते हुए बोला जी ठीक है जैसा आपका आदेश चलों।
और वो विजय को अपने छोटे से अव्यवस्थित घर के अंदर ले जाने लगा।
विजय- बेहद गुस्से में आकर उससे बोला, तुम आपदा के समय में मेरा टाईम खराब नहीं करो और जरूरतमंदों की भी हमको सहायता करनी है। जल्दी से उन झुग्गियों पर ले चलों।
राजू- उससे नजरें छिपा कर बोला साहब मैं आपका टाईम खराब नहीं कर रहा बल्कि आपको जरूरतमंद लोगों के पास ही ले जा रहा था। 

विजय- मैं तुमको अभी जेल भिजवाता हूँ, तुमने इस भयंकर आपदाकाल में झूठ बोलकर हमारा टाईम खराब किया, तुम इस समय इंसान व इंसानियत के दुश्मन हो, जिस घर में तुम चलने के लिए बोल रहे हो, उस घर के लोगों को मदद की आवश्यकता बिल्कुल नहीं हो सकती, इस बात का घर व गाड़ी देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है। मैं फोन करके अभी पुलिस को बुलाता हूँ और तुमको गिरफ्तार करवाकर जेल भिजवाता हूँ।
और विजय गुस्से से लाल होकर अपने मोबाइल से कोई नंबर मिलाने लगता है, राजू ने उसकी मानमनौव्वल करके उसको जैसे तैसे रोका तो वो बेहद गुस्से में होकर वापस अपनी गाड़ी की तरफ जाने लगा।
राजू- उससे रोकते हुए बोला साहब भगवान के लिए वो खाना और राशन तो दे जाते आपका बहुत एहसान होगा, हम लोगों की जान बच जायेगी। मुझे और मेरे घर वालों को खाने व राशन की बहुत ज्यादा आवश्यकता है साहब।
विजय- क्यों झूठ बोल रहे हो, तुमको भीख मांगते हुए व जरूरतमंद लोगों का अधिकार मारते हुए शर्म नहीं आती, तुम्हें व तुम्हारे घर के लोगों को मदद की क्या जरूरत वो तो स्वयं सक्षम है। तुम लोग क्यों लाचार, मजबूर व गरीबों का हक मारना चाहते हो, ईश्वर से ड़रों और भयावह आपदा के काल में इतना बड़ा अपराध नहीं करो और वैसे भी तुमने मदद झूठ बोलकर किसी अन्य व्यक्ति के लिए मंगवाई है।
राजू- साहब कुछ तो रहम करों मुझ पर और मेरे परिवार पर, हम लोग सक्षम नहीं है आप एकबार घर के अंदर जाकर देखों तो सही, हमको मदद की बहुत ज्यादा आवश्यकता है साहब।
विजय- अगर तुम्हारी बात झूठ निकली तो मैं तुम्हें अब जेल भिजवाकर ही दम लुंगा। ठीक है चलों तुम्हारे घर के अंदर चलकर देखते हैं।
राजू- घबराते हुए मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना करते हुए, लड़खड़ाते हुए विजय को अपने घर के अंदर ले जाने लगता है।
विजय- घर के अंदर की हालात देखकर विजय के पैरों तले की जमीन खिसक जाती है, वहां की हालत देखकर उसकी आँखें फटी रह जाती है, वहां पर भूख से बिलखते 12 व 15 साल के दो बच्चे व राजू के 65 साल के बुजुर्ग  माता-पिता व उसकी 40 वर्षीय पत्नी मौजूद होती है, जिनकी स्थिति बेहद दयनीय व खराब होती है, यह देखकर विजय कुछ नहीं बोलपाता है वो तुरंत ही उन लोगों की जांच के लिए चिकित्सक को बुलाने के लिए फोन करता है और साथ आये आदमी से गाड़ी से खाना व राशन घर के अंदर रखने के लिए बोलता है।
राजू- यह सब देखकर उसकी आँखों से अश्रु की धारा फूट पड़ती है और वह कहता है साहब आज आपने मेरे परिवार की जान बचाकर मुझको अपना हमेशा के लिए ऋणी बना लिया, साहब एक हफ्ते से मेरा परिवार भूखा है और मुझको कोई मदद नहीं मिल पा रही थी, इसलिए साहब आज मैंने परिवार की जान बचाने की खातिर झुग्गियों का नाम लेकर झूठ बोलकर राहत सामग्री मंगवाई थी, साहब मैं आपका जीवन भर एहसानमंद रहूंगा। 
ऐसा बोलकर राजू जमीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगा,
विजय- उसका धीरज बांधते हुए उसको चुप करवाता है और फिर राजू से कहता है जब तक डॉक्टर साहब आते है तब तक जरा मुझे अपने वारें में विस्तार से बताओं और यह घर और गाड़ी तो तुम्हारी ही है ना। 

इसे भी पढ़ें: आभार की तालियां (व्यंग्य)राजू- हाँ जी साहब यह घर भी मेरा है यह गाड़ी भी मेरी है, अभी 1 साल पूर्व अपनी व माता-पिता की ताउम्र की कमाई व बैंक से लोन लेकर दोनों खरीदे थे। लेकिन साहब यह पता नहीं था कि लोन लेने के एक साल बाद ही आपदा के चक्कर में एकाएक मेरी नौकरी चली जायेगी और हमारी दर-दर की ठोकर खाने वाली स्थिति हो जायेगी। क्योंकि साहब हमारी कमाई तो बैंक के लोन पटाने में व बच्चों की पढाई में ही खत्म हो जाती है। घर का खर्चा पिताजी की पेंशन से बड़ी ही मुश्किल से चल पाता है साहब। किसी तरह की कोई भी बचत हमारे पास हो नहीं पाती साहब, हम मध्यवर्गीय तो आज के व्यवसायिक दिखावे वाले दौर में केवल कर्ज चुकाने के लिए जिंदा है साहब।
विजय- लेकिन तुम अपने पड़ोसियों, परिचितों, रिश्तेदारों व यार दोस्तों से तो मदद मांग सकते थे।
राजू- आप ठीक कह रहे है साहब, मैंने मदद लेने के लिए बहुत प्रयास किये, लेकिन हर कोई मदद की बात को मजाक मानकर डाल देता था, यह उधार की गाड़ी व मकान आज मेरी व मेरे परिवार की जान का दुश्मन बन गया है साहब, इसके चलते कोई भी मेरी मदद करने के लिए तैयार नहीं है। कई बार मदद के लिए आपदा कंट्रोल रूम भी फोन किया लेकिन उन्होंने भी परिचय सुनते ही मुझको बार-बार झिड़क दिया और दुत्कारते हुए कहा कि तुम गरीबों का हक मारना चाहते हो। मैं खुद कई बार सामाजिक संगठनों के द्वारा बट़ने वाला भोजन व राशन भी लेने गया साहब, लेकिन वहां पर वो लोग मदद करते समय फोटो खींच रहे थे इसलिए शर्म व बच्चों के भविष्य के बारें में सोचकर मैं बार-बार वहां से वापस आ जाता था।
राजू की बेहद खराब वित्तीय स्थिति समझने के बाद विजय की आँखों में आंसू आ जाते है, वह निशब्द हो जाता है, वह सोचता है कि एक मध्यवर्गीय परिवार भी इतने गंभीर आर्थिक संकट में हो सकता आज उसकी समझ में आ गया और उसने इतने ही घर के गेट पर डॉक्टर की गाड़ी आकर रुकता देख उनको अंदर बुलाया, विजय डॉक्टर को घर के अंदर उपस्थित लोगों की स्थिति से अवगत कराता है, डॉक्टर व उसकी टीम उन सभी का चैकअप करती है और डॉक्टर विजय से कहता है भगवान का लाख-लाख शुक्र है जो आपने मुझे बुला लिया भूख के चलते इन लोगों की हालत बहुत खराब है अगर इनको आज समय पर भोजन व चिकित्सा नहीं मिलती तो इनकी जान किसी भी समय जा सकती थी, अब मैंने इनकों एक हफ्ते की दवाई व विटामिन की गोलियां दे दी है अपना मोबाइल नबंर भी दे दिया है अगर कोई दिक्कत होगी तो ये मुझको फोन करके बुला लेंगे वैसे एक हफ्ते बाद में स्वयं इनकों देखने आ जाऊंगा, मैंने इनको थोड़ा-थोड़ा खाना खिलाकर अभी की दवाइयां खिला दी है और बाकी कैसे खानी वो समझा दी है, सुबह तक यह लोग अपने आपको काफी ठीक महसूस करने लगेंगे और डॉक्टर फिर वहां से चला जाता है।
विजय- राजू की तरफ रुख करके उसको अपना पर्सनल नबंर देता है और उससे बोलता है कि तुमने मेरी आँखें खोल दी, शासन-प्रशासन व जिला राहत टीम ने यह कभी भी नहीं सोचा था कि एक मध्यवर्गीय परिवार पर भी आपदा के कारण इतनी भयंकर मार पड़ सकती है, मैं अभी ऑफिस जाकर अपने सीनियरों को स्थिति से अवगत करवाऊंगा और भविष्य में मध्यमवर्गीय परिवारों की मदद का भी प्रावधान करवाऊंगा।

दीपक कुमार त्यागी स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व रचनाकार

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